Shershaah Movie Review: सिर्फ सिद्धार्थ मल्होत्रा की फिल्म है “शेरशाह”, देखना पूरे देश को चाहिए

0


हमारा देश अपनी आज़ादी की 75वीं वर्षगाँठ मनाएगा और इस मौके पर भारत के सबसे जांबाज़ सिपाहियों में से एक कैप्टन विक्रम बत्रा की बायोपिक से बेहतर कौनसी फिल्म हो सकती थी. अमेज़ॉन प्राइम वीडियो ने धर्मा प्रोडक्शंस और काश एंटरटेनमेंट की फिल्म ‘शेरशाह” रिलीज़ की है. फिल्म के नायक स्वर्गीय विक्रम बत्रा हैं जिनकी भूमिका निभाई है सिद्धार्थ मल्होत्रा ने. एक वॉर बायोपिक में कुछ नयापन नहीं होता है क्योंकि कहानी एकदम सीधी होती है लेकिन सिद्धार्थ ने ये भूमिका पूरी शिद्दत से निभाई है. न सिर्फ पूरे देश को बल्कि दिवंगत कैप्टन बत्रा के परिवार को भी उन पर बहुत फख्र होगा. “शेरशाह” एक ऐसी फिल्म है जिसमें आप को सब कुछ पता है फिर भी उसे देखने का अपना मज़ा है. फिल्म की शक्ति यही है. एक ऐसी कहानी जिसको हम कई बार सुन चुके हैं, फिर भी उसे परदे पर देने का मोह संवरण नहीं कर सकते. एक वॉर बायोपिक इस से बेहतर नहीं बनायीं जा सकती थी.

कैप्टन विक्रम बत्रा पालमपुर, हिमालय के थे. उनकी 2 बहनें और एक जुड़वाँ भाई हैं, माता पिता सरकारी स्कूल में टीचर थे. बचपन से साहसी थे और बहुत जल्द उन्होंने फैसला कर लिया था की आर्मी में जायेंगे. चंडीगढ़ के कॉलेज में पढ़ते पढ़ते इश्क़ हो गया और एनसीसी के बेस्ट कैडेट विक्रम को मर्चेंट नेवी और आर्मी में से किसी एक को चुनने का मौका मिला. 1996 में सीडीएस की परीक्षा निकाली, 19 महीने की ट्रेनिंग की और आयएमए से निकलने के बाद 13 बटालियन, जम्मू कश्मीर राइफल के लिए चुने गए और वहां से कश्मीर के सोपोर इलाके में पोस्टिंग मिली. कई बार आतंकवादियों से मुठभेड़ होती रही, विक्रम सेना में आगे बढ़ते रहे और फिर हुआ कारगिल युद्ध. पहले पॉइंट 5140 की चोटी पर कब्ज़ा जहाँ उन्हें कैप्टन बनाया गया और उसके तुरंत बाद कैप्टन अपनी बटालियन के साथ चल पड़े पॉइंट 4875 की चोटी पर कब्ज़ा करने.

ऊंची ऊंची पहाड़ियां जहाँ ऊपर पाकिस्तान ने अपने बंकर बना रखे थे और भारत के बंकरों पर कब्ज़ा कर रखा था. कैप्टन विक्रम बत्रा बहादुरी और जांबाज़ी से अपने सिपाहियों और साथियों का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ते चले, और कभी दो तरफ़ा और कभी तीन तरफ़ा हमला करते हुए पाकिस्तानियों के सैनिक मार गिराने लगे. एक मौके पर वो 4 पाकिस्तानी सैनिकों से बिना हथियार ही भिड़ गए थे और उन्हें मार गिराया. उनके कुछ साथी घायल हो गए, लेकिन कैप्टन बत्रा आगे बढ़ते रहे. आखिर में एक बंकर रह गया था जहाँ से पाकिस्तानी सैनिक लगातार फायरिंग कर रहे थे. उनको रोकने का एक ही जरिया था, सामने से आक्रमण. विक्रम ने अपनी जान की परवाह न करते हुए, अपने साथी को ये कहते हुए रोका कि वो शादी शुदा हैं और विक्रम बैचलर. विक्रम अकेले आगे बढे और गोलियां सीने पर झेलते रहे लेकिन पाकिस्तानी सैनिकों को ख़त्म कर के ही दम लिया. कैप्टन विक्रम बत्रा को मरणोपरान्त, सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. उनकी मंगेतर डिंपल चीमा ने आज तक शादी नहीं की है. कैप्टन विक्रम बत्रा एक अमर सिपाही रहे और भारत के ऐसे बेटे रहे जिसने हमेशा देश को अपने से बड़ा मान कर उसके लिए जान कुर्बान कर दी. मरने से पहले उन्होंने अपनी बटालियन को पॉइंट 4875 पर तिरंगा फहराते हुए देख लिया और फिर ऑंखें मूँद ली.

फिल्म की कहानी में सब कुछ विक्रम की ज़िन्दगी से लिया है फिर भी उसे पटकथा में संदीप श्रीवास्तव ने डाला है. विक्रम का जीवन एक फिल्म की कहानी नहीं थी बल्कि हकीकत थी इसलिए इसकी पटकथा में नाटकीय होने की गुंजाईश ही नहीं थी. कोड नेम शेरशाह, ये दिल मांगे मोर, तिरंगा फहरा कर आऊंगा या तिरंगे में लिपट कर आऊंगा जैसे डायलॉग विक्रम ने खुद ने बोले थे इसलिए संदीप को ज़रा परेशानी नहीं हुई. फिल्म के निर्देशक हैं तमिल फिल्म जगत से इम्पोर्ट किये गए विष्णुवर्धन. किसी समय में ये अवार्ड विनिंग सिनेमेटोग्राफर संतोष सिवन के साथ काम किया करते थे और बाद में कई सफल निर्देशकों के सहायक के तौर पर अपने हथियार भांजते रहे. उनके द्वारा निर्देशित अधिकांश फिल्में सुपरहिट रही हैं और इसलिए करण जौहर ने उन्हें इस फिल्म को निर्देशित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी.

इसके पहले करण जौहर की धर्मा प्रोडक्शंस को गुंजन सक्सेना की बायोपिक के लिए बहुत आलोचना झेलनी पड़ती थी. इस बार वो कोई रिस्क लेना नहीं चाहते थे इसलिए इसलिए फिल्म को ऑथेंटिक बनाने के लिए जनरल जोशी , भारतीय सेना और विक्रम के परिवार से पूरा पूरा गाइडेंस लिया गया. आर्मी ने अपने दो मेजर इस फिल्म के सेट पर डेप्यूट किये थे जो हर बात को बारीकी से देख रहे थे. विक्रम के भाई विशाल बत्रा ने परिवार की पूरी जानकारी दी और विक्रम के बारे में कई निजी जानकारियां दीं जिनकी वजह से फिल्म में सच्चाई नज़र भी आयी. देशभक्ति की फिल्मों में अक्सर इमोशंस कुछ इस तरह से दिखाई जाती हैं कि थोड़ी देर बार लगने लगता है कि इतना नाटकीय क्यों दिखाया जा रहा है. शेरशाह इस मामले में काफी ईमानदार है. कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि ये देशभक्ति का ओवरडोज़ है.

सिद्धार्थ मल्होत्रा ने इस फिल्म के लिए अपनी जान लड़ा दी थी और पिछले कई सालों से इस फिल्म की तैयारी में ही जुटे रहे थे. उन्होंने विशाल बत्रा के साथ, विक्रम के दोस्तों और परिवार वालों के साथ काफी समय बिता कर विक्रम को समझने की कोशिश की. चूंकि फिल्म में सिद्धार्थ, 90 के दशक में कॉलेज जाते हैं तो उन पर शाहरुख़ खान की परछाई साफ़ नज़र आती है. दिल से साफ़ लड़के की भूमिका में सिद्धार्थ ने कमाल ही कर दिया है. जान की परवाह नहीं थी विक्रम को लेकिन वो अपने साथियों को मरते हुए नहीं देखना चाहता था. सिद्धार्थ ने भी विक्रम बनने में कोई कसर नहीं छोड़ी। न सिर्फ उन्होंने किरदार के लिए कड़ी मेहनत की, आर्मी कैम्प्स अटेंड किये बल्कि वो हर उस जगह गए जहाँ से उन्हें विक्रम के बारे में किसी शख्स से कोई निजी जानकारी मिल सकती थी. ये एक कलाकार का कमिटमेंट हैं.

फिल्म में और भी कलाकार हैं. किआरा अडवाणी को रोल तो छोटा मिला है मगर बहुत पावरफुल है. उन्होंने निभाया भी बहुत सुन्दर तरीके से है. जब वो विक्रम के अंतिम संस्कार में दौड़ कर आती हैं, उनके चेहरे पर असीमित दुःख के जो भाव आये हैं, दर्शक खुद अपने आंसू रोक नहीं सकते. जब कैप्टन विक्रम के माता पिता को तिरंगा और कैप्टन विक्रम की टोपी दी जाती है तो बड़े से बड़े पत्थर दिल भी पिघल गए होंगे. विक्रम की यूनिट के एक भी साथी को विक्रम के जाने का सिर्फ दुःख नहीं था बल्कि उनके साथ उनकी यूनिट का सबसे शानदार अफसर और सबसे अच्छा दोस्त खो देने का जो पहाड़ था वो उसे लेकर अपनी बची हुई ज़िन्दगी को काट रहे हैं. बाकी किरदारों में शिव पंडित ने आर्मी अफसर संजीव जामवाल “जिमी” का किरदार क्या खूब निभाया है. शिव बहुत दिनों के बाद बड़े परदे पर नज़र आये हैं और उनका नारियल जैसा कठोर बनने का अभिनय कैसे विक्रम की ज़िंदादिली के आगे टूट जाता है और फिर विक्रम की मौत पर जब वो खुद टूट जाते हैं, तो शिव अपने अभिनय को एक नए मुकाम पर ले जाते हैं.

Sooryavanshi, Fast and the Furious 9, Web series And Movies releasing in August 2021, ATRANGI RE, Dial 100, Shershaah Movie, Bhuj The Pride of india, Jayesh Bhai Jordaar Movie, अतरंगी रे, अगस्त 2021 में रिलीज होने वाली फिल्में और शोज

शेरशाह.

वैसे ही निकेतन धीर मेजर अजय जसरोटिया और शतफ फिगर यानि लेफ्टिनेंट कर्नल वायके जोशी की भूमिका संक्षिप्त थी लेकिन प्रभावी थी. सूबेदार रघुनाथ जो शुरू से आखिर तक विक्रम का साया बन कर रहे, उनके चेहरे पर विक्रम को अपने सामने गोलियां लगते देख कर जो दर्द उभरता है वो अंदर तक हिला देता है. अन्य सैनिकों और अफसर की भूमिका निभाने वाले कलाकारों ने भी देशभक्ति के अनावश्यक नारों और भाषणों से फिल्म को प्रचार फिल्म नहीं बनने दिया. उनकी भीगी आंखें और मौन ही फिल्म के अंतिम कुछ पलों को भारी बनाने के लिए काफी था.

फिल्म में संगीत की भूमिका को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. बी प्राक के गए हुए दोनों गानों ने प्रभावित किया. विक्रम की अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार के समय बी प्राक की बुलंद आवाज़ एक भाले की तरह सीना छेद देती है. फिल्म ख़त्म होने के बाद भी ये गाना दिलोदिमाग पर छाया रहता है. असीस कौर और ज़ुबीन नौटियाल का डुएट रातां लंबियाँ बहुत ही कर्णप्रिय है. फिल्म के गाने फिल्म की रिलीज़ के बाद और लोकप्रिय हो रहे हैं.

इस फिल्म में कमियां निकलना बहुत आसान है क्योंकि दुनिया की हर वॉर फिल्म ऐसी ही होती है, किसी सैनिक पर बनी बायोपिक में इसी तरह की घटनाएं होती हैं. जेपी दत्ता की फिल्मों में भी इसी तरह की बातें दिखाई जा चुकी हैं लेकिन हकीकत ये है कि सैनिक परिवारों में देश से बड़ा कोई धर्म होता ही नहीं है. ये बात उन परिवारों में उन घरों में कहाँ से आती हैं, कोई नहीं समझ सकता. आज जहाँ देश का युवा लाखों कमाने की फ़िराक़ में है, एयर कंडिशन्ड गाड़ियों और घरों की जुगाड़ में लगा है, किसी भी काम को शिद्दत से करने से कतराता है कैप्टन विक्रम बत्रा की ज़िन्दगी एक ऐसा इंस्पिरेशन है जिसे देख कर हिंदुस्तान के हर घर में प्रेरणा जन्म ले सकती है.

shershaah

कैप्‍टन व‍िक्रम बत्रा के क‍िरदार में स‍िद्धार्थ मल्‍होत्रा.

शेरशाह एक शेर किस्म की फिल्म है. भावनाओं की अतिशयोक्ति नहीं है. यहाँ तक कि विक्रम की मृत्यु पर उसके परिवार के सदस्य भी मुफ्त ज्ञान के भाषण नहीं देते। फिल्म विक्रम के भाई के नज़रिये से दिखाई गयी है इसलिए वो पूरी फिल्म में सिर्फ शुरुआत और अंत में नज़र आते हैं. वो भी फिल्म को शहादत भुनाने के नज़रिये से नहीं देखते. उस परिवार के बारे में सोच के देखना चाहिए जिनका जवान बेटा सिर्फ 25 साल की उम्र में देश के लिए सीने पर गोलियां खाता हुआ कुर्बान हो गया. फिल्म, कारगिल युद्ध में खेत रहे उन सभी जवानों और सैनिकों के लिए है जिन्होंने अपनी जान देकर, देश की सीमाओं की रक्षा की और अपनी ज़मीन वापस ली.

फिल्म को सिर्फ इसके उद्देश्य और इसे बनाने की वजह से मत देखिये. सिर्फ इसलिए देखिये की हिंदुस्तान की मिट्टी में आज भी वो कूवत है जहाँ कैप्टन विक्रम बत्रा जैसे फूल खिलते हैं ताकि ये गुलशन आबाद रह सके.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Kiara Advani, Shershaah, Sidharth Malhotra



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here