Read Film Review of Looop Lapeta in hindi EntPKS

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‘Looop Lapeta’ Film Review: अगर फिल्म की शुरुआत में ही ये नहीं बता दिया जाता कि ये फिल्म जर्मन फिल्म ‘रन लोला रन’ का आधिकारिक रीमेक है, तो शायद कहानी की थोड़ी बहुत समानता के अलावा किसी को शक होने की कोई उम्मीद नहीं थी. इसकी वजह है इसकी लेखकों की टीम. विनय छावल (प्रसिद्ध वेब सीरीज असुर और इरफ़ान की अंतिम फिल्म अंग्रेजी मध्यम की लेखक मण्डली के सदस्य), पुनीत चड्ढ़ा, अर्णव नन्दूरी और केतन पेडगांवकर के साथ निर्देशक आकाश भाटिया ने इस बेहतरीन रीमेक का ओरिजिनल भारतीयकरण किया है. कहानी में कई सतहें हैं और सब की सब मज़ेदार हैं, इसलिए एक लेखक के बस तो थी नहीं. लूप लपेटा मस्ती से भरी फिल्म है, शहरी दर्शकों के लिए. गोवा में बसी है लेकिन सुसेगाद नहीं है. चाल मस्तानी है, और स्टोरी टेलिंग का अंदाज़ भी बेपरवाह मस्ती से भरा है. फिल्म को थोड़ा ध्यान से देखिये तो शायद छुपे हुए कुछ मज़ेदार किस्से नज़र आ जायेंगे.

फिल्म की कहानी और उसकी परतों में बहुत कुछ छिपाया गया है. एक जर्मन फिल्म में सत्यवान-सावित्री की कथा कैसे पिरोयी गयी है, इसको समझने का अपना ही मज़ा है. सत्यजीत (ताहिर) और सवीना बोरकर (तापसी) यानी सत्या और सावी यानी सत्यवान और सावित्री. जेंडर स्टीरियोटाइप का मज़ाक उड़ाते हुए ताहिर को सावित्री का किरदार करने को मिलता है. नारद मुनि कहते हैं नारायण नारायण और आज के ज़माने में उसकी जगह ले ली है नगद नारायण ने. अच्छा इरादा हो तो काम ठीक हो जाता है ये बात तापसी को बहुत देर से समझ आती है और अपने दुखों का हरण करने के लिए किसी और से अपेक्षा रखना तो गलत है ये बात ताहिर को समझने में समय लग जाता है.

सावी अपनी मां की अंगूठी, अपने पिता के समलैंगिक साथी की ऊंगली में देखती है. प्यार आसान होता तो हर किसी को मिल जाता इसलिए जैकब और जूलिया की प्रेम कहानी में जैकब की टैक्सी का एक किरदार रखा गया है. रन लोला रन की याद दिलाने के लिए एक सीन में लाल बालों वाली एक लड़की का शॉट भी है. गोवा की गलियों में श्री ममलेश चरण चड्ढा का ज्वेलरी शोरूम भी बनाया गया है, जिसके दो बेटों की शोरूम लूटने की कवायद अलग चलती रहती है और अपनी गंदी हैंडराइटिंग की वजह से अपने बाप के हाथों पकड़े जाते हैं. टूटे घुटने वाले पेअर से तापसी जब कार का साइड व्यू मिरर तोड़ती है तो उसके पैर में दर्द होता है, कितना छोटा और कितना महत्वपूर्ण ऑब्ज़र्वेशन है. बैकग्राउंड में अजान भी एकदम सही समय पर आती है और ज्वेलरी शोरूम में एक अत्यंत नयी भाषा का भजन, नरेंद्र चंचल को ट्रिब्यूट देता सुनाई देता है. फिल्म ध्यान से देखने से कई कई बातें नज़र आती हैं.

तापसी पन्नू ने एक बार फिर महिला सशक्तिकरण का झंडा बरदार किया है, हालांकि इस बार ये स्वरूप थोड़ा अनोखा है. ऐसा लगने लगा है कि कुछ फिल्में अपने साइज और बजट की वजह से सीधे तापसी के दरवाज़े पर पहुंच जाती हैं. एक समय कंगना रनौत के साथ ऐसा होने लगा था, लेकिन उनकी कुछ फिल्में फ्लॉप हो गयीं और कुछ उनका सभी के साथ व्यव्हार फिल्मवालों को पसंद नहीं आया. तापसी की पिछली कुछ फिल्मों को देखें जैसे रश्मि रॉकेट, हसीन दिलरुबा, थप्पड़, सांड की आंख…. इन सबमें किरदार तो अच्छे थे ही, थोड़े फेमिनिस्ट भी थे और तापसी को इनको निभाने में ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है. काफी कुछ उनके मिज़ाज से मिलते जुलते किरदार हैं. ताहिर राज भसीन लम्बे समय से संघर्ष कर रहे थे और अचानक पिछले दो महीनों से सभी जगह नज़र आने लगे हैं.

पहले कबीर खान की फिल्म 83 में सुनील गावस्कर के रोल में दिखे, फिर दो बड़ी-बड़ी वेब सीरीज, ये काली काली आंखें और रंजिश ही सही और अब लूप लपेटा. कहां तो शॉर्ट फिल्म्स में काम करते थे, और मर्दानी जैसी फिल्म में रानी मुख़र्जी के सामने में विलन के रोल में घिन पैदा कराने वाले रोल में नज़र आने के बाद भी ताहिर को लीड हीरो का बड़ा रोल पाने में टाइम लग गया. देर आयद दुरुस्त आयद. फिल्म में एक और कलाकार है जिसको की अभी तक ठीक से कोई इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है- दिब्येंदु भट्टाचार्य. उनके फ़िल्मी करियर का पहला महत्वपूर्ण रोल था अनुराग कश्यप की फिल्म ब्लैक फ्राइडे में येड़ा याकूब का. कई फिल्मों में काम करने के बाद उन्हें ओटीटी प्लेटफॉर्म की वेब सीरीज करने के अवसर मिलने लगे और पिछले 3-4 सालों में वो एक दर्ज़न वेब सीरीज में अच्छा काम करते नज़र आ रहे हैं.

फिल्म में 4 गाने हैं, अलग अलग संगीतकारों के हैं. ये वो संगीतकार हैं जो इंडिपेंडेंट म्यूजिक ज़्यादा करते हैं इसलिए लाजवाब कम्पोजीशन और लिरिक्स होने के बावजूद गाने हिट नहीं होंगे. एक एक गाना चुन चुनकर बनाया गया है और मुफीद है. बैकग्राउंड म्यूजिक बनाया है बंद द जैम रूम (राहुल पैस, नरीमन खंबाटा) ने जो इस फिल्म की हाईलाइट की श्रृंखला में एक और कड़ी है. एकाध जगह गाली गलौच है हिंदी में और कई जगह गाली गलौच है अंग्रेजी में. गोवा में कॉमन सी बात है. एक बात जो कभी हज़म नहीं होती वो है तापसी का कैसिनो पहुंच जाना और दांव खेल कर जुए में जीत जाना जबकि कोई संयोग नहीं होता जिसमें वो कैसिनो पहुंच सकती हो. खैर छोटी सी बात है और ताहिर का किरदार शुरू से जुआरी है इसलिए इसे अनदेखा किया जा सकता है. ताहिर के किरदार की कोई बैकस्टोरी नहीं है, जबकि तापसी की है इसलिए अखरता है लेकिन फिल्म तापसी की वजह से देखी जायेगी ये भी सत्य है.

निर्देशक आकाश भाटिया ने इसके पहले एक्सेल एंटरटेनमेंट की क्रिकेट पर बनी बहुचर्चित वेब सीरीज “इनसाइड एज” के कुछ एपिसोड डायरेक्ट किये थे. ये उनकी पहली फिल्म है. बहुत ध्यान से लिखी है, बहुत ध्यान से बनायी है और हर डिपार्टमेंट पर उनकी पैनी नज़र रही है ऐसा साफ़ नज़र आता है. कई शॉर्ट फिल्मों के सिनेमेटोग्राफर यश खन्ना ने कैमरे से जादू उतार दिया है. गाय रिची की फिल्मों जैसे स्नैच, लॉक स्टॉक एंड टू स्मोकिंग बैरल्स या फिर मैथ्यू वॉन की लेयर केक जैसी स्टोरी टेलिंग का मज़ा इस फिल्म में देखने को मिलता है. एडिटर प्रियंक प्रेम कुमार ने फिल्म को कस के रखा है और शायद इसी वजह से इंस्पेक्टर डेविड के किरदार की एंट्री सीधे ही हो गयी है और ताहिर के किरदार की कोई बैकस्टोरी नहीं है.

इस एडिटिंग की वजह से आप कुछ भी मिस करने से कतराएंगे. फिल्म का एक और रंगीन पहलू है आर्ट डायरेक्शन संतोष विश्वकर्मा का और प्रोडक्शन डिज़ाइन प्रदीप पॉल फ्रांसिस और दिया मुख़र्जी का. गोवा की खूबसूरती या गंदगी शूट करने से बचे हैं और फिल्म की कहानी पर ही ध्यान रखा गया है. निर्देशक आकाश भाटिया और लेखक मण्डली की जीत है लूप लपेटा क्योंकि इसमें रीमेक की आत्मा पर ओरिजिनालिटी का नया ढांचा चढ़ाया गया है. गौर करने वाली बात है कि अंग्रेजी में लूप की स्पेलिंग में 3 “ओ” दिखाए गए हैं और कहानी भी तीन तरीकों से ख़त्म होती है.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Film review, Taapsee Pannu



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