Preetam Review: कृष्ण का वर्ण श्याम मंजूर है, इंसान का नहीं ‘प्रीतम’

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Preetam Review: मलयालम एड फिल्म निर्माता टीम को एक अवसर मिला, मराठी फिल्म बनाने का. फिल्म बनायी गयी. अच्छी बनी. अच्छे गाने भी थे. प्यारी सी कहानी थी. इस से ये बात तो सिद्ध हो गयी कि कहानियां किसी एक जगह की नहीं होती, परिवेश बदलने से कहानियों की मूल आत्मा पर कोई फर्क नहीं पड़ता. अमेजॉन प्राइम वीडियो पर आप मराठी फिल्म ‘प्रीतम’ देखेंगे तो आपको लग सकता है कि ये तो एक मलयालम फिल्म है लेकिन फिल्म की कहानी को कोंकण के एक गांव में इतनी सुंदरता से बिठाया गया है कि आप कहानी से प्रेम कर लेते हैं. फिल्म कोई सिनेमेटिक मास्टरपीस नहीं है लेकिन मधुर सी कहानी को देखना चाहिए ताकि हमेशा ग्रैंड स्केल का नाम लेकर भोंडी फिल्में देखने से बचा जा सके. ये हमारा सहयोग होगा छोटे मगर कथापूरक सिनेमा को आगे बढ़ाने में.

हर गांव में जाति व्यवस्था तो भेदभाव का एक महत्वपूर्ण कारण है ही लेकिन ‘प्रीतम’, भेद भाव को थोड़ा और कुरेद के देखती है. आपस में किसी की शारीरिक संरचना को लेकर मजाक उड़ाना बचपन में शुरू हो जाता है और माता पिता इसे रोकते नहीं हैं. जैसे कोई मोटा है तो उसे मोटे/ तोंदू/ हाथी कहना ज़रूरी है. कोई पतला है तो उसे बारीक/ सिंगल हड्डी या एक पसली कहना सामान्य मानते हैं. उसी तरह के एक और भेद को ‘प्रीतम’ में उठाया गया है. फिल्म का हीरो प्रीतम कुडालकर (प्रणव रावराणे) का रंग सांवला है, या थोड़ा गहरा है. पूरा गांव उसे काले/ कालिये/ कालू/ डामर जैसे नामों से पुकारता है. यहां तक कि उसे जवानी के मित्र – सरपंच का बेटा, एक दर्ज़ी, एक किराने वाला और नाटकों का डायरेक्टर; सब उसे कालू ही कहते हैं. जब उसे गांव की पंचायत में सजा सुनाई जाती है तो उसका पूरा नाम लिया जाता है और वो इस बात से खुश हो जाता है कि मुक़दमे की वजह से ही पूरे गाँव को उसका नाम मालूम पड़ा. मार्मिक विचार था, फिल्म में इतनी आसानी से कह दिया गया. ये ऐसी पीड़ा है जिस से हिंदुस्तान का हर बच्चा कभी न कभी किसी न किसी वजह से गुज़रता ही है.

प्रीतम पूरे गांव में दूध सप्लाई करता है. उसके पास कई भैसें, कुछ गायें, एक अदद मां और एक शराबी पिता है जिसको वो अपनी कमाई देता रहता है ताकि वो नशे में ही रहे. प्रीतम के गांव में एक सुन्दर लड़की आती है सुवर्णा (नक्षत्र) जो बहुत गोरी है और पास के शहर में नौकरी करती है. प्रीतम को उस से एक तरफ़ा प्यार हो जाता है. एक बार सुवर्णा कुंए में गिर जाती है तो प्रीतम उसे बचा लेता है. प्रीतम की गलतफहमी बढ़ जाती है कि सुवर्णा भी उसे प्यार करती है. जब उसकी गलतफहमी दूर होती है और पता चलता है कि उसका प्यार एक तरफ़ा है तो वो सुवर्णा से दोस्ती कर लेता है. प्रीतम का प्लान होता है कि वो सुवर्णा को भगा कर ले जाएगा ताकि सबको लगे कि दोनों में प्यार है. वह उसे अपनी स्कीम में शामिल कर लेता है. दोनों रात को भागते हैं, पकडे जाते हैं और पंचायत बैठ कर उनके भविष्य का फैसला करती है. क्या प्रीतम को सुवर्णा मिलती है, ये आगे की कहानी है.

प्रणव की शक्ल दयनीय है, वो दबा कुचला और प्रताड़ित नज़र आता है. उसको देख कर लगता है कि ज़िन्दगी भर उसने अपना नाम “कालू” ही सुना होगा। एलांगो ओडाई की कहानी पर स्क्रिप्ट लिखी सुजीत कुरूप ने और स्क्रीनप्ले/ डायलॉग लिखे हैं गणेश पंडित ने. कहानी बहुत ही सरल है. मलयालम फिल्मों में अक्सर आसान सी कहानी पर फिल्में बनाते हैं और किरदारों के आपसी संबंधों को फिल्म का आधार बनाया जाता है. इस फिल्म में निर्देशक सिजो रॉकी ने वही फार्मूला लगाया है और अच्छी फिल्म बनायीं है. रात को प्रणव और उसके मित्रों की शराब पीने की बैठक के दृश्य, बिलकुल ज़िन्दगी से उठाये हैं. पियक्कड़ मंडली में एक या दो ऐसे किरदार होते हैं जो शराब लाना, पानी-सोडा-चखना लाना और फिर सबके ड्रिंक्स बनाने के काम करते हैं. इस फिल्म में प्रीतम ये सब काम करता है और उसके दोस्त उसे बुरी तरह ही ट्रीट करते हैं. अपने शराबी पिता से परेशान प्रीतम, क्लाइमेक्स में पिता के हाथ से थप्पड़ खाता है तो उसे बुरा नहीं लगता. सुवर्णा का पीछा करते करते वो बात करने के लिए बस में चढ़ जाता है और सुवर्णा को कहता है कि उसका टिकट ले ले क्योंकि वो पैसा नहीं लाया, अच्छा बना था. सुवर्णा उसे लौटने के लिए पैसे देती है लेकिन वो उसे खर्च नहीं करता क्योंकि इसके ठीक पहले वो उसकी दोस्ती ठुकरा चुकी है. बिना बात के पैसे लेना भीख होता है जैसा इमोशनल ब्लैकमेल वाला डायलॉग प्रीतम बड़े अच्छे से इस्तेमाल करता है. प्रणव ने किरदार के साथ न्याय किया है.

फिल्म की हीरोइन नक्षत्रा हैं जो इसके पहले मराठी टीवी सीरियल में नज़र आयी हैं. अच्छा काम किया है. सहज और सरल लगी हैं. क्लाइमेक्स में थोड़ा चीखना चिल्ला और प्रवचन क़िस्म की बातें भी की है. एक स्कूल प्रिंसिपल की बेटी बनी हैं, और किरदार एकदम सूट भी किया है. बाकी किरदारों में सूत्रधार और गाँव में नाटकों के निर्देशक के तौर पर उपेंद्र लिमये हैं. उन्होंने शायद परिचय की वजह से फिल्म की होगी, क्योंकि इस छोटी फिल्म के वो सबसे बड़े अभिनेता हैं. कुछ और कलाकार हैं जो रोल की ज़रुरत के मुताबिक ठीक हैं. कहीं कहीं ओवर एक्टिंग भी देखने को मिली है हालाँकि ये मुख्य किरदार नहीं थे इसलिए वो ज़्यादा परेशान नहीं करती.

फिल्म प्यारी है. सरल है. सादी है. परिवार के साथ बैठ कर देखेंगे तो शायद वो बोर हो जायेंगे लेकिन अपने जीवन साथी के साथ, बहुत भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में थोड़ा सुकून और अच्छा सिनेमा देखना चाहते हैं तो ‘प्रीतम” एकदम सही है. इस फिल्म में कुछ कमियां हैं – कहानी की कसावट पूरी तरह बरकरार नहीं रहती. फर्स्ट हाफ में किरदार जमाने के लिए बहुत समय जाया किया गया है. सेकंड हाफ में रोमांच और लाया जा सकता था लेकिन वो कहीं मिस हो गया. एडिटर जयंत जठार को सिनेमेटोग्राफर ओम नारायण की शूट की हुई इस फिल्म को फिर से एडिट करना चाहिए. अगर तरीके से एडिट किया जाए तो ये फिल्म और मनोरंजक हो सकती है. बहरहाल, देख लीजिये. कोंकण के कस्बे की कहानी है. आप को पसंद आएगी. भाषा इतना बड़ा रोड़ा नहीं है क्योंकि सब टाइटल हैं.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Amazon Prime, Film review



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