Maharani Review: पॉलिटिकल ड्रामा में नवीनता के लिए कोई जगह नहीं बची है

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Maharani Review: पिछले कुछ 7-8 सालों से हमारे देश में राजनैतिक चेतना बढ़ते बढ़ते मध्यमवर्गीय घरों और उनके बेडरूम तक पहुंच गयी है. चुनाव, नेताओं के दांव पेंच, कॉन्ट्रैक्ट्स, भ्रष्टाचार जैसी बातों से मध्यम वर्ग परिचित तो था मगर इन विषयों पर न वो बात करता था और न ही भाग लेता था. आजकल राजनीति कुछ इस तरह की हो गयी है कि हर शख्स अपने स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के जरिये देश की हर बात पर कोई राजनैतिक टिप्पणी करने लगा है. ऐसे माहौल में जब कोई राजनीति आधारित वेब सीरीज या फिल्म देखने को मिलती है तो उसमें किसी तरह की कोई नवीनता मिलने की सम्भावना लगभग नहीं के बराबर होती है. सोनी लिव पर प्रोड्यूसर सुभाष कपूर की नयी वेब सीरीज महारानी का भी कमोबेश यही हाल है जबकि वेब सीरीज देखने लायक है.

1975 में गुलजार ने आंधी नाम की एक पॉलिटिकल फिल्म बनायीं थी, जिसमें सुचित्रा सेन का किरदार इंदिरा गांधी पर आधारित बताया गया था. वहां से अब तक हम, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर आधारित द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जिन्दगी पर आधारित बायोपिक नरेंद्र मोदी जैसी फिल्में देख चुके हैं. हालांकि युवा, राजनीति, गुलाल या फिर माचिस जैसी राजनैतिक पृष्ठभूमि की फिल्मों के अलावा पंजाब और दक्षिण भारत मेंराजनीति पर आधारित कई सफल फिल्मों का निर्माण किया जाता रहा है, हिंदी फिल्मों में इस तरह के प्रयोग कम हुए हैं. जब से ओटीटी प्लेटफॉर्म आये हैं, पॉलिटिक्स पर आधारित कॉन्टेंट की भरमार सी हो गयी है. बहुचर्चित वेब सीरीज तांडव हो या मिर्ज़ापुर या फिर सिटी ऑफ लिमिट्स जैसी राजनैतिक परिवार की कहानी, कुछ कुछ कॉन्टेंट बहुत ही बढ़िया था, कुछ निहायत ही बकवास. अंग्रेज़ी में नेटफ्लिक्स पर ‘हाउस ऑफ कार्ड्स’ देखने वालों को हिंदी कॉन्टेंट शायद कमजोर लगेगा. इन सब के बीच, सोनी लिव पर नयी वेब सीरीज ने दस्तक दी है- महारानी.

80 और 90 के दशक की बिहार की राजनीति की कहानी है. मोटा मोटा देखा जाए तो कहानी प्रसिद्ध जननेता लालू यादव और उनकी धर्म पत्नी राबड़ी देवी के जीवन में घटित किस्सों से प्रभावित नजर आती है. जाति पर आधारित राजनीति, अगड़े-पिछड़े, ऊंची जाति नीची जाति, छुआ छूत, सरकार की शह पर सर उठाता नक्सलवाद, अभूतपूर्व भ्रष्टाचार, सरकार की खाली तिजोरियां, दल बदल की राजनीति, गाँवों में होते नरसंहारों के बीच नाकारा मानी जाती पुलिस और उसकी राजनीति के बीच एक प्यारी सी कहानी है महारानी.

रानी भारती (हुमा कुरैशी) के पति हैं चीफ मिनिस्टर भीमा भारती (सोहम शाह), जिन पर छठ की पूजा के दौरान दो अज्ञात हमलावार गोलियां चला देते हैं. बिहार की राजनीति में भूचाल आ जाता है और कई लकड़बघ्घे और गिद्ध, लाश की उम्मीद में मंडराने लगते हैं. इसमें शामिल हैं, हेल्थ मिनिस्टर नवीन कुमार (अमित सियाल), पार्टी के अध्यख गौरी शंकर पांडे (विनीत कुमार), राज्यपाल गोवेर्धन दास (अतुल तिवारी). घायल मुख्यमंत्री एक चाल चलते हैं और अपनी अनपढ़ पत्नी रानी को मुख्यमंत्री बनवा देते हैं. आगे की कहानी में कैसे राजनीति की शतरंज पर एक प्यादे की तरह लायी गयी रानी, अपने से बड़े प्रतिद्वंदियों का सामना करती है और साथ ही अपनी अफसर ऑन स्पेशल ड्यूटी कावेरी (कनी कुश्रुति) की मदद से, निजी अनुभवों को सामने रख कर निर्णय लेती हैं और प्रदेश का सुचारु रूप से सञ्चालन करती हैं.

हुमा कुरैशी का अभिनय सधा हुआ है. उनके पास अभिनय की क्षमता तो है मगर रोल में ऐसी जगहें कम थीं. हुमा के पास इमोशनल सीन्स में काफी कुछ करने का स्कोप था. सचिवालय में पहले दिन बतौर मुख्यमंत्री उनका कहना कि सब पुरुष, एक विवाहिता स्त्री को फूल दे रहे हैं, वो अच्छा नहीं लगता. अपनी पार्टी की मीटिंग में महिलाओं को न देख कर उनका ये सोचना कि इसमें औरतें तो हैं ही नहीं…अच्छा लगता है. इसके अलावा, अपने घायल पति की सेवा करना, पति पर हमले के बाद बच्चों को संभालना, पति के सामने अपना पक्ष रखना, बच्चों को हाथ से दूर जाते हुए देखना जैसे कई सीन थे जहाँ हुमा और अच्छा काम कर सकती थी, लेकिन अफ़सोस, वो वहां थोड़ी पीछे रह गयी. एक अनपढ़ औरत जो 45 गिनने के लिए 5 कम 50 गिनती हैं, वो 4 महीने में 985 करोड़ धड़ल्ले से बोलने लगती है…ये बात थोड़ी कम हज़म होती है. एक अनपढ़ गंवार गृहणी को ज़बरदस्ती मुख्यमंत्री बनाने का दृश्य अच्छा बन सकता था, लेकिन वो इतने सतही ढंग से फिल्माया गया है कि विरोधाभास कहीं खो ही जाता है. इसी कड़ी में हुमा जब अपने विरोधियों की परवाह न करते हुए, धड़ल्ले से सदन में बिना रुके भाषण देती हैं…उनके किरदार में जो ये अमूल चूल परिवर्तन आता है, वो अचानक ही आ जाता है… ये दर्शकों को खटकता है.

सोहम शाह एक कड़क अभिनेता हैं. उन्होंने इस वेब सीरीज में भी अपने अभिनय का लोहा मनवा लिया है. सिर्फ दो जगह वो अपनी पत्नी के निर्णयों से न खुश हो कर अपनी राय ज़ाहिर करते हैं और उनका फ़्रस्ट्रेशन नज़र आ जाता है. वो रानी के आगे बढ़ने को स्वीकार करते हुए नज़र आते हैं. अमित सियाल ने कुछ दिन पगले काठमांडू कनेक्शन में दमदार अभिनय से सबको प्रभावित किया था, अब महारानी में भी काँइयाँ पॉलिटिशियन के तौर पर स्क्रीन पर छा जाते हैं. अमित में काफी पोटेंशियल है लेकिन वो थोड़ा टाइपकास्ट होते जा रहे हैं. बाकी किरदार भी अच्छे हैं और मंजे हुए कलाकारों की वजह से उनके रोल्स भी उचित प्रभाव छोड़ते हैं.

इस सीरीज में कुछ कमियां हैं, जो चुभती हैं. कहानी में नयापन बिलकुल नहीं है. चाल पर चाल, दल बदल, धोखा, आखिरी समय में पार्टी बदलना या एक ट्रम्प कार्ड की तरह चाल चल कर अपनी हार को जीत में बदलना, ऐसे ही किस्से इस सीरीज में देखने को मिलते हैं. चूंकि सीरीज में 90 का दशक दिखाया गया है, उन दिनों बिहार में मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल इतनी आसानी से शायद नहीं हो रहा था. टिपिकल माल मसाला के तहत एक अदद बाबाजी भी रखे गए हैं जिनके आश्रम में गैर कानूनी लोग आते जाते रहते हैं. ब्राम्हणवाद की झलकियां हैं तो पुलिस का भ्रष्टाचार भी है जिसमें बिहार के डीजीपी सिद्धार्थ गौतम (कन्नन अरुणाचलम) कन्फ्यूज्ड रहते हैं कि वो दलित हैं, या 35 साल से बिहार में पोस्टेड हैं व वो दक्षिण भारत से बुलाये गए आईपीएस हैं.

महारानी की समस्या है कि इस कहानी में जो जो राजनैतिक पैंतरे होते हैं, वो सब दर्शकों ने किसी न किसी वेब सीरीज या फिल्म में देख रखे हैं इसलिए किसी भी नेता के रंग बदलने पर दर्शक भौंचक्के नहीं रह जाते, बल्कि ये तो होना ही था जैसा रिएक्शन देते हैं. किसी भी किरदार के पाला बदलने से किसी को न तो आश्चर्य होता है और न ही अफ़सोस बल्कि जबराजनीति के शतरंज पर चाल चली जाती है तो रानी के साथ भी किसी की सहानुभूति नहीं जुड़ती.स्वभावगत सीधापन लेकर जब अनपढ़ रानी, पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेती हैं तो उनका बार बार अटकना और हिंदी के कठिन शब्दों का उच्चारण करने का प्रयास करना नाटकीय लगता है. महारानी में संभावनाएं अनंत थीं. ये एक बढ़िया व्यंग्य का रूप ले सकती थी. बिहार कीराजनीति को पूरी तरह से उघाड़ के रख देने का काम कर सकती थी. जो काम प्रकाश झा की फिल्मराजनीति में श्रुति सेठ ने किया था, उसी तरह का एक किरदार कैबिनेट मंत्री बनने का सपना लिए घूमती रहती है.

इस सीरीज को लिखा है नंदन सिंह और उमा शंकर सिंह ने. जॉली एलएलबी वाले सुभाष कपूर ने इस सीरीज की रचना की है और निर्देशन है करण शर्मा का. सुभाष कपूर को छोड़ कर किसी का भी नाम आम दर्शकों तक नहीं पहुंचा है. करण ने कहानी को बिलकुल सीधा सीधा एक लेन में चलाया है. फ्लैशबैक बहुत कम इस्तेमाल हुआ है. सब प्लॉट्स नहीं के बराबर हैं और इस वजह से राजनीतिक गतिविधियों में वज़न की कमी नज़र आती है. करण के लिए इतनी बड़ी वेब सीरीज निर्देशित करने का ये पहला अवसर था और इस वजह से वो कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे. उनका काम संतोषजनक है, प्रोड्यूसर के पैसों का सही इस्तेमाल किया गया है. सिनेमेटोग्राफी, एडिटिंग और संगीत भी अच्छा है लेकिन अतिरिक्त प्रभाव डालने में असमर्थ है.

महारानी में थोड़ी गालियां हैं जो कि उत्तर प्रदेश या बिहार की पृष्ठभूमि के किसी भी सीरियल, वेब सीरीज या फिल्म की तुलना में बहुत कम है. बिहार की राजनीति में बाहुबली और अपराधियों का बड़ा दखल रहा है, वो इस सीरीज में कम नज़र आते हैं. चारा घोटाले को अन्न घोटाले में बदल कर निर्माता स्वयं को सुरक्षित समझ रहे होंगे. आम तौर पर इस तरह के सीरीज में कोई नवीनता नहीं होने की वजह से इसे देखने से बचा जाना चाहिए मगर फिर भी इसमें जो किरदार हैं वो असल ज़िन्दगी में किस शख्सियत पर आधारित हैं, ये जानने में कुछ मज़ा आएगा. लगता तो है कि इसका अगला सीजन बन सकता है.undefined

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Film review, OTT Platforms, Sony liv



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