Jai Bhim Review Pouring red chilli powder in the minds of emotionally dead ss

0


Jai Bhim Review: पुलिस लॉकअप में अपराधियों के साथ मार पीट आम बात है. कुंठित पुलिसवाले जब किसी अपराधी को थर्ड डिग्री टॉर्चर करते हैं और यंत्रणा सहन न कर पाने की वजह से वो बेहोश हो जाता है तो पुलिस वाले उनकी आंख या नाक में लाल मिर्च का पाउडर डाल कर ये सुनिश्चित करते हैं कि वो अभी तक ज़िंदा है या नहीं. अपने आस पास होते अन्याय को देख कर अनदेखा करने वालों के लिए ‘जय भीम’ भी ऐसा ही करती है, सिर्फ ये पाउडर उनके दिमाग को झकझोर कर रख देता है. आदिवासियों पर होने वाले अन्याय का लेखा जोखा सदियों पुराना है. आदि काल से अपनी पहचान, अपने सम्मान, और अपनी हस्ती को साबित करने के लिए देश के असली निवासी, ऊंची जाति के ठेकेदारों के सामने सदैव गिड़गिड़ाते नजर आते हैं. बिना पूछे, बिना जांच के पुलिस की मदद से उन्हें अनंत काल के लिए जेल भेज दिया जाता है जहां उन्हें शारीरिक प्रताड़ना दी जाती है. अक्सर ये लोग जेल में मर जाते हैं, तो इन्हें लावारिस लाश बता कर सड़कों पर फेंक दिया जाता है और पुलिस पूरे प्रकरण से अपने हाथ धो लेती है.

जय भीम एक ऐसे वकील की कहानी है जो पुलिस के आतंक और पुलिस के अमानवीय व्यवहार के खिलाफ मोर्चा लड़ता रहता है. अपनी बुद्धि से वो एक ऐसे ही आदिवासी युवक की गर्भवती पत्नी को इन्साफ दिलाने के लिए अपने आप को झोंक देता है जिसका पति कई दिनों से चोरी के झूठे इलज़ाम में लॉकअप में बंद दिखाया जाता है. जय भीम समाज के चेहरे पर एक तमाचा है. एयर कंडिशन्ड कमरों में बीयर पीते हुए और चिकन कहते हुए पांच सितारा समाजवाद के रक्षक लोगों के हलक में हाथ डालने की हिमाकत है. शायद इसको देखने के बाद सच का सबसे नंगा स्वरुप हम महसूस कर सकें. या शायद, हमारे साथ तो ऐसा हो नहीं सकता या सबसे अच्छा – ये तो फिल्म है. ऐसा होता थोड़ी है.

राजनीति का एक स्वरुप यह भी है. वादे होते हैं गरीबी हटाने के, गरीबों के उत्थान के. अमीरी- गरीबी के बीच का फासला पाटने के. जैसे ही वादा पूरे करने का समय आता है, अमीरों के भले के कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं. जंगल काटने के, फैक्ट्री या उद्योग डालने के बहाने आदिवासियों को विस्थापित करने के. सबसे दुखद बात, इन आदिवासियों को नागरिक भी नहीं माना जाता क्योंकि इनके पास न राशन कार्ड, न आधार कार्ड न वोटर कार्ड…और बैंक की पासबुक तक नहीं होती. शहर में कोई अपराध होता है, शहर के पास रह रहे आदिवासियों को पुलिस उठा कर ले जाती है, झूठा मुकदमा दायर करती है और अनिश्चित काल के लिए जेल में डाल देती है. यहाँ दुखों का अंत नहीं होता, शराब और ताक़त के नशे में धुत्त पुलिस, अपना सारा गुस्सा और पुरुषत्व इन गरीब और निरीह आदिवासियों पर निकालती है. कइयों की हवालात में मौत हो जति है, महिलाओं के साथ बलात्कार होता है और इतनी यंत्रणा मिलती है कि वो आदिवासी मर जाना बेहतर समझते हैं. जय भीम इस कड़वी सच्चाई का भयावह स्वरुप सामने लाती है.

फिल्म की समीक्षा करना मुश्किल है. इतना दुःख, इतनी कड़वाहट, इतना सच देखने की हमें आदत नहीं है. शुरू में जरूर सब नया लगता है क्योंकि हमने ऐसा कभी देखा ही नहीं है, कल्पना करना ही मुश्किल है. भारत के राष्ट्रपति कलाम साहब द्वारा मद्रास हाई कोर्ट में नियुक्त जस्टिस के चंद्रू के जीवन के एक बड़े हिस्से पर आधारित यह फिल्म भयावह है. स्वाभाव से ही अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले चंद्रू की ज़िन्दगी पहले कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (एम्) की संगत में गुज़री. लॉ कॉलेज में हॉस्टल न मिलने पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करने वाले चंद्रू ने आदिवासियों आवाज़ उठायी थी. 1995 की एक घटना (जिस पर फिल्म आधारित है) ने चंद्रू के जीवन जो एक नयी दिशा दी. बतौर वकील चंद्रू ने हमेशा मानवाधिकार के केस लड़े और उनकी दलीलों और तथ्यों को ढूंढ निकलने की क्षमता की वजह से सैकड़ों आदिवासी और निरीह व्यक्तियों को इन्साफ मिला. बतौर जज उनके फैसलों ने कई लोगों की ज़िन्दगी बदल दी. सच्चे और ईमानदार वकील और जज के रूप में जस्टिस के चंद्रू को पूरा मद्रास हाई कोर्ट आज तक सलाम करता है.

चंद्रू की भूमिका निभाई है सुपरस्टार सूर्या ने. मूलतः एक कमर्शियल फिल्म एक्टर सूर्या ने इस विषय पर फिल्म बनाने और उसमें मुख्य भूमिका निभाने का जोखिम उठाया है. फिल्म की कहानी जब लिखी जा रही थी या फिल्मायी जा रही थी, सूर्या पूरे समय द्रवित और आंदोलित ही रहे. आदिवासी लड़कियों की शिक्षा के लिए, उनके उत्थान के लिए सूर्या ने अपनी कमाई से करोड़ों रुपये दिए हैं. डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के बारे में आज के दर्शकों की जानकारी न्यूनतम ही है. वे सिर्फ संविधान के निर्माता नहीं थे, बल्कि एक महार जाति के प्रतिभाशाली शख्स थे जिनका जीवन सिर्फ और सिर्फ गरीबों और आदिवासियों या नीची जातियों के लिए सामान जुटाने में बीत गया. उन्हीं के जीवन दर्शन से प्रभावित इस फिल्म में सूर्या ने वकील चंद्रू की भूमिका में गज़ब कर दिया है. उनके एक एक सीन में उनके सीने में जलती आग, पुलिस के दुर्व्यवहार के खिलाफ उनकी आंखों के तेवर और रुआबदार आवाज़ से गूंजते नारे, हर दर्शक को अंदर तक हिला देते हैं. अपने पति को ढूंढने के लिए परेशान संगिनी की भूमिका एक अत्यंत प्रतिभाशाली अभिनेत्री लीजोमोल होसे ने निभाई है. अपने आप को असुंदर बनाकर फिल्म में एक नॉन-ग्लैमरस आदिवासी औरत का किरदार निभाने के लिए कलेजा चाहिए. लीजोमोल ने गर्भवती महिला बन कर भी चेहरे पर एक ओज बनाये रखा है. पुलिस लॉकअप में वो पुलिस से मार खाती है लेकिन उसका इरादा टूटने के बजाये मज़बूत होते जाता है. एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस आईजी की भूमिका प्रकाश राज के हिस्से आयी है. प्रकाश जितने कद्दावर इंसान हैं उतने ही कद्दावर अभिनेता हैं. भूमिका निभाना उनके लिए सहज लगा. सबसे क्रूर भूमिका एसआई गुरुमूर्ति की है जिसे अभिनेता तमिल ने निभाया है. इनके अभिनय को देखने से रूह काँप जाती है. पुलिस का सबसे घिनौना चेहरा निभाने के बाद इनकी निजी मनःस्थिति कैसी हुई होगी, ये सोचने वाली बात है.

इस फिल्म के असली हीरो लेखक निर्देशक टीजे ज्ञानवेल हैं. उन्होंने एक एक सीन में जान लगा दी है. पूरी फिल्म में बस एक सीन फ़िल्मी किस्म का है. जब सरकारी अधिवक्ता जनरल एस राम मोहन (राव रमेश) मुक़दमे के फैसले से पहले सूर्या से चाय की दुकान पर समझौते के इरादे से आते हैं. इस एक दृश्य के अलावा सच जैसे तेजाब के तरह हमारे जेहन पर बरसता रहता है. टीजे ज्ञानवेल को फिल्म अच्छी होने का अनुमान तो था लेकिन फिल्म के जरिये देशव्यापी बहस छिड़ जाने की कल्पना उन्होंने नहीं की थी. डॉक्टर अम्बेडकर की सीख लोगों तक पहुंची और दर्शकों में जागरूकता फैली, और संभवतः अब समाज संज्ञान लेगा इन सभी पीड़ितों का, इतना सा खवाब देखने वाले निर्देशक की मनोकामना पूरी हुई है. सामजिक फिल्मों की श्रेणी में जय भीम को सर्वोच्च स्थान दिया जाना चाहिए. पुलिस के लॉकअप में किये गए अत्याचार का ये नंगा नाच शायद अब आम आदमी को जगा सकेगा और वो अब किसी मज़लूम के लिए आवाज़ उठा सकेंगे.

जाति व्यवस्था हमारी दुनिया का दुर्भाग्य है. सत्ता हासिल करने के लिए किसी को ऊंची और किसी को नीची जाति का घोषित कर के इंसान ने एक व्यवस्था बनाने की असफल कोशिश की है. हज़ारों साल और शिक्षा के बावजूद हमारे देश में इंसान को उसकी जाति से ही पहचाना जाता है. नीची जाति में जन्म लेना अपराध क्यों है? गरीब होना या अशिक्षित होना गुनाह क्यों है? अपने अधिकारों को न पहचान पाने के लिए ज़िम्मेदारी किस की है? जय भीम को देखने के लिए लोहे का कलेजा चाहिए. आंखों में मिर्च डाल अपनी आत्मा को जगाने के लिए देखिये. शायद दिल के किसी कोने में एक इंसान बचा हो.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Film review, OTT Platform



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here