Hum Bhi Akele Tum Bhi Akele Film Review: आइडिया ही नहीं उसका एक्जिक्यूशन भी अच्छा होना चाहिए

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फिल्म – हम भी अकेले तुम भी अकेले

मिनट्स – 117

प्लेटफॉर्म – डिज्नी+ हॉटस्टार

समलैंगिक संबंधों पर हिंदी फिल्म बनाने के कई बार प्रयास किए जाते रहे हैं. न सिर्फ गे बल्कि अब लेस्बियन रिलेशनशिप्स पर भी कहानी में आने लगी है. नैतिकता की बातों को दरकिनार करके देखें तो चूंकि इस तरह के सम्बन्ध आज समाज में हो रहे हैं, तो इन पार बात करना, साहित्य गढ़ना, फिल्म बनाना लाजमी है. दुःख तब होता है जब फिल्मकार या तो उसे सेक्स से जोड़ कर देखते हैं या फिर उसका उपहास बना डालते हैं. समलैंगिक संबंधों में भावनात्मक जुड़ाव और वैचारिक एकात्मकता को कम ही महत्व दिया जाता है. डिज्नी+ हॉटस्टार पर हाल ही में रिलीज़ ‘हम भी अकेले तुम भी अकेले’, बाकी फिल्मों की तुलना में कहानी के तौर पर थोड़ा बेहतर करती है. डेढ़ इश्क़िया, मार्गरिटा विथ अ स्ट्रॉ, माय ब्रदर निखिल, या फिर दीपा मेहता की फायर… कुछ ऐसी फिल्में हैं जो समलैंगिक संबंधों के भावनात्मक जुड़ाव पर काफी फोकस करती हैं.

करण जौहर की फिल्मों में अक्सर गे रिलेशनशिप का मज़ाक बनाया जाता है लेकिन उनकी कुछ फिल्मों में इन संबंधों को बड़े ही अलग तरीके से दिखाया जाता है. हम भी अकेले तुम भी अकेले में एक नयी बात है, इसमें हेरोइन लेस्बियन है और हीरो गे. इसके अलावा पूरी फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं है जो इस फिल्म में दर्शकों को बांध के रख सके. मानसी दुबे (ज़रीन खान) एक पुराने ख़यालात वाले परिवार का हिस्सा है लेकिन स्वाभाव के तौर पर खुद को विद्रोही मानती है. एक को-एड स्कूल में पढ़ते-पढ़ते एक पडोसी लड़के के साथ डॉक्टर-डॉक्टर खेलने लगती है. मानसी की मां इस हरकत से काफी दुखी हो जाती है और उसे लड़कियों के स्कूल में भर्ती करवा देती है. इस प्रक्रिया में मानसी को लड़कियों के प्रति आकर्षण हो जाता है.

वहीं दूसरी और एक डिसिप्लिन पसंद परिवार का लड़का वीर प्रताप रंधावा (अंशुमन झा) अपने मित्र के प्रति आकर्षित हो जाता है, उनके बीच सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं जबकि वीर का मित्र शादी शुदा है. मानसी अपनी प्रेमिका से मिलने दिल्ली और फिर मक्लिओडगंज जाती है. इस यात्रा में उसके साथ होता है वीर जो अपनी बदकिस्मती से परेशान है. न मानसी की प्रेमिका के पिता उनके संबंधों को स्वीकार करते हैं और न वीर का मित्र, अपने परिवार को अपने गे होने की बात कह पता है. अंत में मानसी और वीर साथ रहने का निर्णय लेते हैं. कहानी में थोड़ी नवीनता है. पहली बार एक ही कहानी में एक लेस्बियन और एक गे साथ-साथ इतनी संजीदगी से दिखाए गए हैं. एक दृश्य में ज़रीन ढाबे पर खा पी कर बिना बिल चुकाए भाग जाती है, इस काम में अंशुमन उनका साथ देते हैं, बंधन तोड़ कर आज़ाद होने के लिए एक नए तरह का प्रतीक इस्तेमाल किया गया है.

फिल्म में ज़रीन और अंशुमन दोनों ने ही अपनी तरफ से सब कुछ देने की कोशिश की है, लेकिन प्रतिभा की कमी का क्या इलाज है. ज़रीन के चेहरे पर विश्वसनीयता नहीं नज़र आती. एक लेस्बियन के रोल में आपने अजीब दास्तान में कोंकणा सेन शर्मा को देखा होगा, ज़रीन या उनकी प्रेमिका के चेहरे या हाव भाव से ऐसा कुछ नज़र नहीं आता. दूसरी ओर अंशुमन ने स्त्रैण बनने का असफल प्रयास किया है. वो सबसे सामने ये स्वीकार नहीं कर पाते हैं कि वे एक गे हैं, और इसकी कश्मकश उन्हें अंदर से परेशान करती रहती है. अंशुमन इतने अच्छे लिखे किरदार को निभा नहीं पाते हैं और दर्शकों को वो एक बेहद कमज़ोर शख्स के तौर पर नज़र आते हैं.

ज़रीन और अंशुमन का साथ रहने का फैसला बहुत ही विचित्र अंदाज में लिया जाता है. दर्शकों को उनके प्रति कोई भावना डेवलप हो उस से पहले ही कहानी खत्म होने लगती है. फिल्म में और भी किरदार हैं, छोटी भूमिकाएं हैं. किसी का भी काम इतना प्रभावी नहीं है कि उसका ज़िक्र किया जाए. ज़रीन और अंशुमन की केमिस्ट्री अच्छी तो है मगर पूरी फिल्म ये दोनों नहीं खींच सकते थे. फिल्म के निर्देशक हैं हरीश व्यास, जिन्होंने ये फिल्म 2019 में बना ली थी, फिर लॉकडाउन की वजह से प्रोडक्शन का बचा हुआ काम रह गया था और फिर इस तरह की फिल्म को ओटीटी पर ही रिलीज किया जा सकता है, जिस वजह से ये फिल्म अब देखने को मिली है. इसके पहले फिल्म, चुनिंदा फिल्म फेस्टिवल्स में शिरकत कर चुकी है. फिल्म सूजन फर्नांडिस और हरीश ने मिल कर लिखी है.

कहानी में इमोशंस कमजोर रहे. एकाध सीन छोड़ दें तो अंशुमन की लाचारी पर गुस्सा आने लगता है. जरीन भी कमअक्ल नजर आती है. फिल्म में ‘बुल्ला की जाना मैं कौन’ गाने का भरपूर दोहन किया गया है. रबी शेरगिल के गाये हुए ‘बुल्ला की जाना’ से इस वर्जन की धुन बहुत अलग है. बाकी गाने अत्यंत साधारण हैं, मगर फिल्म की रफ्तार से गानों का मिजाज मेल खाता है. फिल्म की कहानी में जबरदस्ती ट्विस्ट डाले जाते रहे जिस वजह से कहानी की मूल आत्मा प्रभावित हो गई है. हलके फुल्के रोमांस के तौर पर फिल्माने की वजह से विषय की गंभीरता से भी कॉम्प्रोमाईज हो गया. फिल्म बहुत बुरी नहीं है, मगर इस तरह की नयी कहानी में अच्छे अभिनय से काफी कुछ कर पाने की गुंजाईश बाकी रह गयी. इस थीम की फिल्मों में ये काफी कमजोर मानी जाएगी.undefined

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Film review



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