Dial 100 Review: आखिर दर्शकों के लिए फिल्म क्यों नहीं है “डायल 100”?

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एक तरफ आपके पास हैं एक ऐसे लेखक- निर्देशक जिन्होंने अक्स, रंग दे बसंती, कुर्बान और स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर जैसी फिल्में लिखी हैं और अमेरिकी वेब सीरीज “24” का हिंदी अडाप्टेशन डायरेक्ट किया हो यानि रेंज़िल डीसिल्वा. आपके पास डायलॉग राइटर हों निरंजन आयंगर जिन्होंने करण जौहर और महेश भट्ट (Mahesh Bhatt) की कई फिल्में जैसे जिस्म, पाप, कल हो न हो, कभी अलविदा न कहना और डी-डे जैसी फिल्मों के डायलॉग लिखे हों यानि निरंजन आयंगर. अवॉर्ड विनिंग अभिनेता जैसे मनोज बाजपेयी (Manoj Bajpayee), नीना गुप्ता (Neena Gupta) और साक्षी तंवर (Sakshi Tanwar). सोनी पिक्चर्स फिल्म्स इंडिया जैसे प्रोड्यूसर हों. और फिर भी आप एक ऐसी फिल्म बनाते हैं जिसको देखने की कोई वजह दर्शक चाह कर भी ढूंढ नहीं पाते तो निश्चित तौर पर आप कुछ गलत कर रहे हैं. ज़ी5 पर रिलीज़्ड फिल्म “डायल 100 (Dial 100)” को देख कर ये चेतावनी देना ठीक है कि फिल्म दर्शकों के लिए नहीं बनायीं गयी है.

पिछले कुछ दशकों में पुलिस का नंबर 100 ज़िन्दगी बचाने और अपराध रोकने के लिए जाना जाने लगा है. कुछ कुछ शहरों में प्रगतिशील पुलिस अधिकारियों की वजह से ये नंबर एक आधुनिक कॉल सेण्टर की तरह काम करता है और रियल टाइम लाइव लोकेशन जैसी सुविधा अब सामने कंप्यूटर पर नज़र आ जाती है. ऐसे में कॉल ट्रेस करना और अपराध की जगह पर पुलिस कण्ट्रोल रूम की वैन भेजना बहुत आसान हो गया है. डायल 100 ऐसे ही एक कॉल से जन्मी कहानी है जिसे पुलिस इंस्पेक्टर निखिल सूद (मनोज बाजपेयी) अपने कण्ट्रोल रूम में रिसीव करते हैं और एक औरत सीमा (नीना गुप्ता) आत्मा हत्या करने की धमकी देती रहती है. एक कर्मठ अधिकारी की तरह मनोज उन्हें रोकने की कोशिश करते हैं लेकिन इस बार सीमा का प्लान निखिल की पत्नी प्रेरणा (साक्षी तंवर) और उनके बेटे ध्रुव (स्वर कांबले) की आपसी तनातनी का फायदा उठाने का है. कैसे निखिल इस मुसीबत से निकलते हैं, क्या वो अपने बिगड़ते सँभलते बेटे को और अपनी ताना मारती पत्नी को सीमा के चंगुल से बचा पाते हैं, यही फिल्म का कनफ्लिक्ट है.

फिल्म में थ्रिलर होने के गुण मौजूद हैं. कहानी सुनने में तो अच्छी लगती है. ज़बरदस्त एक्टर्स हैं. मनोज बाजपेयी का तो ग्राफ चढ़ता ही जा रहा है और “द फॅमिली मैन 2” की सफलता के बाद तो अब नयी जनरेशन को भी उनकी एक्टिंग की ताक़त का अंदाज़ा हो गया है. नीना गुप्ता को बहुत काम नहीं मिलता है लेकिन बधाई हो के बाद से उनके पास भी नए किस्म के रोल्स आ रहे हैं और उनके पास अब स्वतंत्रता है रोल चुनने की. साक्षी तंवर सहजता की प्रतिमूर्ति हैं. उनको अभिनय करते देखना इसलिए भी अच्छा लगता है कि उन्हें देख कर घर का एहसास होता है.

फिल्म की विवशता उसकी राइटिंग है. मुद्दे पर आते आते, किरदारों की जमात दिखाते दिखाते इतना समय जाया कर दिया जाता है कि जब मनोज और नीना के बीच चूहे-बिल्ली का खेल शुरू होता है तो वो बड़े ही अजीब तरीके से जल्दी जल्दी ख़त्म कर दिया जाता है. एक रात की कहानी वाले थ्रिलर्स के लिए लेखक को पूरी फिल्म दिमाग में सोचनी पड़ती है और फिर लिखने के बाद उसे बेदर्दी से एडिट करना पड़ता है ताकि फिल्म में कम समय में ज़्यादा दिखाया जा सके. थ्रिलर फिल्मों में गुत्थी सुलझाने का काम और वहां से अपराधी तक पहुंचने का काम महत्वपूर्ण है लेकिन डायल 100 यहाँ चूक गयी है. लम्बी राइटिंग है और कुछ हद्द तक उबाऊ.

सिर्फ अच्छे अदाकारों के दम पर कमज़ोर कहानी को एक बेहतरीन फिल्म के रूप में बदलते देखना थोड़ा कठिन है. कुछ ऐसी ही समस्या रेंज़िल की पहली फिल्म कुर्बान में भी थी. सैफ और करीना की प्रेम कहानी इतनी लम्बी हो गयी थी कि जब असली किस्सा सामने आया तो वो बहुत ही आसान तरीके से ख़त्म हो गया. हालाँकि रेंज़िल ने 24 नाम की वेब सीरीज भी डायरेक्ट की थी जिसमें पूरी सीरीज 24 घंटे में होने वाले घटनाक्रम पर आधारित है लेकिन ये ओरिजिनल नहीं थी, ये सिर्फ एक अडाप्टेशन था. किरदारों से सहानुभूति रखने का खामियाजा दर्शक भुगतने को तैयार हों तो डायल 100 देख सकते हैं. मनोज, नीना और साक्षी; तीनों ही अपने आप में ज़बरदस्त हैं और इस फिल्म में उन्होंने और भी बेहतरीन काम किया है. अगर कहानी साथ दे देती तो ये फिल्म और बेहतर हो सकती थी. फिल्म का अंत ज़रूर सोचने पर मजबूर करता है और माँ-बाप अपने बच्चों को कितनी आज़ादी दें, ये फैसला आप पर छोड़ता है.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Film review, Manoj bajpai, Manoj Bajpayee, Neena Gupta



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