Bannerghatta Review: बैंहरघट्टा फिल्म की कहानी फोन कॉल्स से आगे बढ़ती है

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Bannerghatta Review: कैसा रहे कि पूरी की पूरी फिल्म तीन या चार घंटे के घटनाक्रम पर आधारित हो और उसमें एक मारुति ओमनी वैन हो जिसके हीरो ड्राइवर हो और पूरी फिल्म की कहानी उसके फ़ोन पर आने वाले कॉल्स और उसके फ़ोन से लगाए जाने वाले कॉल्स से पूरी की जा सके? थोड़ा मुश्किल लगता है, लेकिन अमेज़ॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज मलयालम फिल्म बैंहरघट्टा (Bannerghatta) ने इस असंभव को भी संभव कर के दिखाया है. फिल्म सॉलिड बनी है. उधार लिए पैसों से अपने लिए मारुति वैन खरीदने वाला ड्राइवर आशिक (कार्तिक रामकृष्णन) अपनी गाड़ी में एक पैकेट छुपा कर ले जा रहा है. फिल्म की शुरुआत में उसे कई फोन आते रहते हैं. कभी उसके दोस्त का, कभी उसकी चिड़चिड़ी बीवी का, कभी पैकेट के मालिक का.

आशिक सबका जवाब देते देते गाडी चला रहा है. उसकी मां फोन कर के कहती है कि आशिक की बहन बैंगलोर इंटरव्यू के लिए गयी हुई है, लेकिन अब उस से बात नहीं हो पा रही है. आशिक की बड़ी देर बाद फोन पर बहन से बात होती है तो फोन पर ही आ रही आवाजों से उसे पता चलता है कि उसकी बहन को अगवा कर लिया गया है. आशिक अपने दोस्तों, परिचितों, पत्नी के दोस्त, बहन की सहेली सभी को फ़ोन कर के बहन के बारे में पता करने को कहता है. ढेरों फ़ोन कॉल्स के बीच में एक जगह उसकी वैन ख़राब हो जाती है. रात को पुलिस की गाडी आती है और आशिक़ के व्यव्हार से उन्हें संदेह होता है. गाडी की तलाशी में पैकेट बरामद होता है, आशिक़ का फ़ोन पुलिस जब्त कर चुकी है इसलिए उसे अपनी बहन के बारे में कोई आईडिया नहीं लग पता. एक समय वो चिढ कर पुलिस को धक्का दे कर, उन्हें मार कर अपना फोन छीन लेता है और अपनी बहन के बारे में ताज़ा जानकारी पा लेता है.

छोटीसी कहानी है. गोकुल रामकृष्णन और अर्जुन प्रभाकरन ने मिल कर लिखी है. इसके पहले भी वो “बत्तीसम अध्ययम तेइसम वाक्यम” नाम की फिल्म साथ में लिख चुके हैं जो बहुत ही अनूठी फिल्म थी. इन्हीं दोनों ने वो फिल्म डायरेक्ट भी की थी. बैंहरघट्टाके निर्देशक विष्णु नारायणन हैं. विष्णु इस से पहले गोकुल और अर्जुन के साथ उनके असिस्टेंट के तौर पर काम किया करते थे. ये उनकी पहली फीचर फिल्म है. फिल्म की एडिटिंग की है परीक्षित ने जिनकी भी ये पहली फिल्म है. बतौर सिनेमेटोग्राफर अपनी पहली फिल्म करने वाले बीनू ने बैंहरघट्टा में अच्छा काम किया है. अंधेरे और चलती वैन के दृश्यों में बड़ा अच्छा सामंजस्य बिठाये रखा है.

आशिक़ के रोल में कार्तिक को अभिनय सीखने की शुरुआत कर देनी चाहिए. बहुत ही भावना विहीन अभिनय करते हैं. कई बार चेहरे पर बेचारगी लाने का असफल प्रयास भी करते हैं. पैसों को लेकर लापरवाह हैं और पैसा कमाने के लिए कोई उल्टा सीधा काम करने के लिए तैयार हैं, लेकिन चेहरे पर कोई भाव ही नहीं आते. ना तो मूर्ख लगते हैं और न चतुर. फिल्म की शुरुआत होती है तो लगता है कि ये कोई रोड ट्रिप की कहानी होगी. फिर लगता है कि बीवी और बेटे से भागते इंसान की कहानी होगी. फिर लगता है पैसा लेकर भागते इंसान की कहानी होगी.

ये सब फिर भी ठीक है लेकिन अचानक से बहन के अपहरण की कहानी सामने आते ही पूरी फिल्म की रफ्तार बदल जाती है और दर्शक कन्फ्यूज्ड हो जाते हैं. पुलिस के आने के बाद फिल्म की रफ़्तार में थोड़ा रोमांच आने लगता है और तभी फिल्म खत्म हो जाती है. लगातार बदलते फिल्म के ट्रैक से कहानी से जुड़ाव नहीं हो पाता और न ही हीरो से किसी तरह की कोई सहानुभूति होती है. पुलिस के सामने हीरो का अभिनय बहुत ही अव्यवहारिक नज़र आता है. यदि आपकी बहन का अपहरण हो गया हो आप पुलिस को समझा कर फ़ोन अटेंड करने की इजाज़त मांगेंगे लेकिन हीरो समझाने की कोई कोशिश नहीं करता और पुलिस समझने की कोशिश नहीं करती.

फिल्म की अच्छी बात है कि कहानी में एक्शन पूरा का पूरा फ़ोन कॉल्स के ज़रिये दिखाया गया है. ये एक नए किस्म का एक्सपेरिमेंट है. फिल्म कभी भी बहन तक नहीं जाती और न ही उसके अपहरण को दिखाती है. फिल्म एक बार देखी जा सकती है अगर आप अभिनय को प्राथमिकता न दें और फोन कॉल्स के सीक्वेंस को समझने की कोशिश करें.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Amazon Prime Video, Tollywood



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