दर्शक तो मूर्ख हैं ही, साबित करेगी ‘ब्रेजन’ – News18 हिंदी

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Review:  मीटू आंदोलन 2006 में तराना बुर्के द्वारा शुरू किया गया था लेकिन कई सालों तक इसकी कुछ ख़ास पूछ परख नहीं हुई बल्कि पुरुष-सत्तात्मक समाज में इसे दबाया और कुचल दिया गया. 2017 में प्रसिद्ध अभिनेत्री और एक्टिविस्ट अलीसा मिलानो ने अपने ट्वीट के ज़रिये इस आंदोलन को राष्ट्रीय और फिर अंतर्राष्ट्रीय सुर्खी में बदल कर इस आंदोलन को एक नयी दिशा दी. इसके बाद न सिर्फ हॉलीवुड बल्कि दुनिया भर के तमाम देशों में कई पुरुषों को नौकरी छोड़नी पड़ी, पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा या उन्हें नौकरी से निकल दिया गया. इसके अलावा भी अलीसा मिलानो ने हमेशा ही अपनी राय और अपने संघर्षों से एक विचारवान अभिनेत्री की छवि कायम की है. हालाँकि इसके लिए उन्हें कड़वे अपमान के घूँट, घटिया ट्रोलिंग और सोशल मीडिया पर घनघोर विरोध का सामना भी करना पड़ा है, फिर भी उनकी अपनी सोच हमेशा से कायम रही है और अपनी बात पर टिकी हुई हैं. इसलिए जब प्रसिद्ध लेखिका नोरा रॉबर्ट्स की किताब “ब्रेज़न वरच्यूस” पर बन रही फिल्म “ब्रेज़न” के मुख्य किरदार के लिए अलीसा का चयन किया गया, लाखों लोगों ने इसका विरोध किया, यहां तक कि नोरा को खुद लिखना पड़ा कि वो अलीसा की समर्थक हैं और इस रोल में उनका चुने जाने को नोरा का पूरा समर्थन है. ब्रेजन 13 जनवरी 2022 को नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ की गयी है.

ब्रेज़न की कहानी एक टिपिकल क्राइम थ्रिलर के जैसी है और नोरा रॉबर्ट्स की अधिकांश किताबें भी इसी मिज़ाज की होती हैं इसलिए दर्शकों की आम प्रतिक्रिया होगी – ऐसा तो कई फिल्मों में पहले ही देख चुका हूँ. इस फिल्म में कथानक के तौर पर कई कमज़ोरियाँ हैं और सबसे ख़राब बात, ये फिल्म किस तरह के दर्शकों के लिए बनायीं गयी है ये बिलकुल भी स्पष्ट नहीं है. हॉलीवुड में फिल्मों के पीछे मार्केटिंग का बड़ा हाथ होता है. प्रोडक्ट, प्राइस, प्रमोशन, प्लेस एंड पीपल यानि मार्केटिंग के 5 पी ही किसी फिल्म के डेवलपमेंट से डिस्ट्रीब्यूशन तक की सभी बातें तय करते हैं. ब्रेज़न की समस्या ये है कि वो सभी मामलों में चूक गयी है. फिल्म शुरू होने के कुछ देर बाद ही समझ आ जाता है कि खून करने का शक किन किन लोगों पर जा सकता है और अपराधी होने की सम्भावना किसकी ज़्यादा है. न तो खून करने के दृश्यों में डर लगता है और न ही खूनी की तलाश में की गयी जासूसी में किसी तरह का कोई रोमांच नजर आता है. इसलिए ब्रेज़न देखने का अगर ख्याल आ भी रहा है तो उसे रोक लीजिये क्योंकि इसमें क्राइम इन्वेस्टीगेशन के तत्व भी ठीक से नहीं पिरोये गए हैं.

सफल क्राइम नॉवेलिस्ट ग्रेस (अलीसा) की बहन कैथलीन (एमिली) एक स्कूल टीचर है और साथ ही एक एडल्ट वेबसाइट पर मॉडल की तरह काम करती है. कैथलीन का खून हो जाता है. कैथलीन के पडोसी पुलिस डिटेक्टिव एड (सैम पेज) की मदद से ग्रेस इस केस को सुलझाने की कोशिश करती है. इस दौरान एडल्ट वेबसाइट पर काम करने वाली एक और लड़की का खून हो जाता है. केस बमुश्किल आगे बढ़ रहा होता है. ग्रेस चूंकि एक क्राइम नॉवेलिस्ट है तो वो पुलिस के साथ आधिकारिक तौर पर छान बीन करने में मदद करती है. कैथलीन के स्कूल स्टूडेंट्स से भी पूछताछ होती है. इस बीच में एक और मॉडल पर जानलेवा हमला होता है और वो बच जाती है. पुलिस की जांच और ग्रेस के दिमाग की मदद से असली कातिल पकड़ा जाता है. सीरियल मर्डर के केस में सबसे महत्वपूर्ण बात होती है पैटर्न तलाशने की. ब्रेज़न में पैटर्न एकदम ही आसान सा है तो इसलिए एडल्ट वेबसाइट पर कैथलीन के ग्राहकों पर ही शक होता है. इन ग्राहकों में से असली कातिल वो ही शख्स हो सकता है जो कि इन मॉडल्स की असली पहचान जानता हो, इसी शहर का हो और तीनों में से किसी एक को बहुत अच्छे से जानता हो. दर्शक ये बात समझते हैं लेकिन पुलिस और ग्रेस इस बात को परखने में बहुत देर लगा देते हैं.

मज़े की बात है कि दर्शक, कैथलीन का खून होने के बाद के 10 मिनिट में ही समझ जाते हैं कि हत्यारा कौन है और उसने हत्या क्यों की होगी लेकिन पुलिस जो कई सालों से मर्डर इन्वेस्टीगेशन करती आ रही है और ग्रेस जो कई सालों से मर्डर मिस्ट्री नॉवेल्स लिखती आ रही है, एक एक कड़ी कर के आखिर में उसी खूनी तक पहुँचते हैं जिसे दर्शकों ने पहले ही पहचान लिया था. ज़ोडियक, मर्डर ऑन द ओरिएंट एक्सप्रेस, सेवन या क्लू जैसी कई लाजवाब मर्डर मिस्ट्री बनायीं जा चुकी हैं. इसके अलावा जेम्स हेडली चेज़, अर्ल स्टैनले गार्डनर, अगाथा क्रिस्टी जैसे उपन्यासकारों ने मर्डर की तहकीकात पर सैकड़ों नावेल लिखे हैं. और तो और नोरा रॉबर्ट्स की किताब ब्रेज़न वर्च्यूस (जिस पर यह फिल्म आधारित है) भी 1989 में प्रकाशित हुई थी. मर्डर मिस्ट्री उपन्यासों पर फिल्म बनाते समय स्क्रीनप्ले में रहस्य और रोमांच डालना ज़रूरी होता है और जो असल अपराधी होता है उसकी पहचान फिल्म में आखिर तक छुपा के रखी जाती है. ब्रेज़न फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है.

एडिथ स्वेन्सन, डोनाल्ड मार्टिन और सुज़ैट कुटूर का स्क्रीनप्ले एकदम थका हुआ है. बड़े ही वाहियात से रोमांटिक डायलॉग भी रखे गए हैं जो कि फिल्म की थीम से बिलकुल उलटे लगते हैं. शॉन किर्कबी की प्रोडक्शन डिज़ाइन से भी रहस्य का भान नहीं होता और न ही एडिटर क्रिस्टोफर स्मिथ की कैंची से. निर्देशिका मोनिका मिशेल ने दर्जनों टेलीविज़न फिल्में और टेलीविज़न सीरीज निर्देशित की हैं. ये उसी कड़ी में एक और फिल्म है और कहने की ज़रुरत नहीं है कि निहायत बोरिंग है. लेखक और निर्देशक जब दर्शकों को मूर्ख समझते हैं और ये उम्मीद करते हैं कि लिखते या निर्देशित करते समय उन्हें जितना रोमांच महसूस हुआ होगा उतना ही दर्शकों को भी होगा, तो ब्रेज़न जैसी फिल्म बनती है. नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ होने की वजह से इसको देखने वाले लाखों में होंगे मगर पसंद करने वाले शायद ही कुछ हज़ार. न ठीक से रोमांटिक थ्रिलर बन पायी और न ही मर्डर मिस्ट्री, ब्रेज़न को देखना यानी सरदर्द को आमंत्रित करने जैसा है और खुद को मूर्ख साबित करने जैसा है.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Film review, Netflix



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